Tuesday, 1 March 2016

अंतर्मन की आवाज

आज खामोश रहने का मन हैं
सोचता हूँ
थम जाए सब कुछ
और फ़ैल जाये सन्नाटा चारों तरफ
हवा से हिलते पत्ते
आपस में लड़ती गिलहरियां
बिजली से चलता पंखा
घड़ी की टिक टिक
पंछियों की चहचाहट
ये सब कुछ पल के लिए
स्थिर हो जाए
मुझे आज कुछ और सुनना हैं
कहीं सुना था

कि
अंतर्मन बात किया करता हैं
मुझे भी सुननी हैं 
अपने अंतर्मन की आवाज
वो आवाज

जिसको दबा दिया जाता हैं अक्सर
जब जब उठती हैं ये आवाज
पैरों तले कुचल दिया जाता हैं
आज मैं तन्हा बैठ कर 
सुनना चाहता हूँ
कि आखिर क्या कह
ता हैं
मेरा अंतर्मन मुझसे ??

कल्याण के विश्नोई 

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