Tuesday, 22 March 2016

वक़्त बदलेगा

माना रौशनी थोड़ी सी कम है
पलकों के कोने भी नम है
उम्मीदें मद्धम मद्धम है
और उदासी का आलम है
रुक ज़रा एक सांस तो ले ले
सोच कहाँ रहा कुछ कम है
तेरा मेरा साथ कुछ ऐसा है
नई कहानी बन जायेगी
रौशनी... फिरसे फैलेगी
पलकें फिरसे मुस्काएँगी
उम्मीदों के पुष्प खिलेंगे
और बहारें छा जाएँगी

Tuesday, 1 March 2016

अंतर्मन की आवाज

आज खामोश रहने का मन हैं
सोचता हूँ
थम जाए सब कुछ
और फ़ैल जाये सन्नाटा चारों तरफ
हवा से हिलते पत्ते
आपस में लड़ती गिलहरियां
बिजली से चलता पंखा
घड़ी की टिक टिक
पंछियों की चहचाहट
ये सब कुछ पल के लिए
स्थिर हो जाए
मुझे आज कुछ और सुनना हैं
कहीं सुना था

कि
अंतर्मन बात किया करता हैं
मुझे भी सुननी हैं 
अपने अंतर्मन की आवाज
वो आवाज

जिसको दबा दिया जाता हैं अक्सर
जब जब उठती हैं ये आवाज
पैरों तले कुचल दिया जाता हैं
आज मैं तन्हा बैठ कर 
सुनना चाहता हूँ
कि आखिर क्या कह
ता हैं
मेरा अंतर्मन मुझसे ??

कल्याण के विश्नोई 

Monday, 29 February 2016

कविता ही तो है

खुली आँखों में ख्वाब सजाना
फिर उम्मीदों से दौड़ लगाना
कविता ही तो है
बेवजह का शोर मचाना
या भ्रमर सा गुनगुनाना
कविता ही तो है
किसी का यादों में आ जाना
या किसी को अपनी याद दिलाना
कविता ही तो है
अरमानो का पेड़ लगाना
कामयाबी का फल पा जाना
कविता ही तो है
आँखों में आंसू आ जाना
फिर भी मंद मंद मुस्काना
कविता हो तो है
नजरों से नजरें मिल जाना
और अदा से नजर झुकाना
कविता ही तो है
इन मेरे शब्दों को पढ़ते जाना
और मन में अपना कल दोहराना
कविता ही तो है।

कल्याण के विश्नोई